Tuesday, 14 July 2026

शायरी : क़िस्त 006

शायरी : क़िस्त 006

एक शे’र है

जो इक्तिदार की कुर्सी पे जल्वा फ़रमा हैं

न जाने क्यों उन्हें ऊँचा सुनाई देता है ।

-सुरेश चन्द्र ’शौक़

[इक्तिदार = हुकूमत]

ऐसे ही अन्य  मारूफ़ और मशहूर अश’आर यहाँ सुनें--


-आनन्द पठक ’आनन’ -
880092 7181

Sunday, 12 July 2026

शायरी : क़िस्त 005

 शायरी : क़िस्त 005

एक शे’र है--

न जाना कि दुनिया से जाता है कोई

बहुत देर की मेहरबाँ आते आते ।

-दाग़  देहलवी-

ऐसे है और भी मशहूर-0-मा’रूफ़ अश’आर आप यहाँ सुन सकते हैं--


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-आनन्द.पाठक ’आनन’-

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शायरी : क़िस्त 004

शायरी : क़िस्त 004

एक शे’र है--

 रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बाद

सुर्ख़-रू होता है इन्साँ ठोकरे खाने के बाद ।

-नासिख़-

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शायरी : क़िस्त 003

 शायरी : क़िस्त 003

एक शे’र --

तू इधर उधर की न बात कर, यह बता कि क़ाफ़िला क्यों लुटा ,

हमे रहजनों से गिला नहीं , तेरी रहबरी  का सवाल  है ।

-शहाब जाफ़री -


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शायरी : क़िस्त 002

शायरी : क़िस्त 002

एक शे’र है----

बग़ैर पूछे जो अपनी सफ़ाई देता है ,

नहीं भी हो, तो भी मुजरिम दिखाई देता है।

-सुरेश चन्द्र ’शौक़’- 

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शायरी : क़िस्त 006

शायरी : क़िस्त 006 एक शे’र है जो इक्तिदार की कुर्सी पे जल्वा फ़रमा हैं न जाने क्यों उन्हें ऊँचा सुनाई देता है । -सुरेश चन्द्र ’शौक़ ’ [इक्तिदार...