शायरी : क़िस्त 006
एक शे’र है
जो इक्तिदार की कुर्सी पे जल्वा फ़रमा हैं
न जाने क्यों उन्हें ऊँचा सुनाई देता है ।
-सुरेश चन्द्र ’शौक़’
[इक्तिदार = हुकूमत]
शायरी : क़िस्त 006
एक शे’र है
जो इक्तिदार की कुर्सी पे जल्वा फ़रमा हैं
न जाने क्यों उन्हें ऊँचा सुनाई देता है ।
-सुरेश चन्द्र ’शौक़’
[इक्तिदार = हुकूमत]
शायरी : क़िस्त 005
एक शे’र है--
न जाना कि दुनिया से जाता है कोई
बहुत देर की मेहरबाँ आते आते ।
-दाग़ देहलवी-
ऐसे है और भी मशहूर-0-मा’रूफ़ अश’आर आप यहाँ सुन सकते हैं--
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-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181
शायरी : क़िस्त 004
एक शे’र है--
रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बाद
सुर्ख़-रू होता है इन्साँ ठोकरे खाने के बाद ।
-नासिख़-
ऐसे ही मशहूर-ओ-मा’रूफ़ अश’आर आप यहाँ सुन सकते हैं-
शायरी : क़िस्त 003
एक शे’र --
तू इधर उधर की न बात कर, यह बता कि क़ाफ़िला क्यों लुटा ,
हमे रहजनों से गिला नहीं , तेरी रहबरी का सवाल है ।
-शहाब जाफ़री -
ऐसे ही मशहूर-ओ-मा’रूफ़ अश’आर आप यहाँ सुन सकते हैं-
शायरी : क़िस्त 002
एक शे’र है----
बग़ैर पूछे जो अपनी सफ़ाई देता है ,
-सुरेश चन्द्र ’शौक़’-
ऐसे ही मशहूर-ओ-मा’रूफ़ अश’आर आप यहाँ सुन सकते हैं-
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-आनन्द.पाठक ’आनन’-
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शायरी : क़िस्त 006 एक शे’र है जो इक्तिदार की कुर्सी पे जल्वा फ़रमा हैं न जाने क्यों उन्हें ऊँचा सुनाई देता है । -सुरेश चन्द्र ’शौक़ ’ [इक्तिदार...