इस ब्लाग का उद्देश्य ----
मित्रो !
आप ने बातचीत के दौरान अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए लोग मौक़े महल
किसी शायर का कोई मशहूर शे’र या कोई एक मिसरा सुनाते है मगर शायर का नाम कभी कभी नहीं बता पाते। ऐसे शे’र अपने अपने याददास्त के हिसाब से सुनाते हैं या किसी से या कहीं से सुन कर सुनाते हैं । जैसे--
तंदरुस्ती हज़ार ने’मत-- घर को लगी है आग घर के चिराग़ से--बड़ी देर कर दी मेहरबाँ आते आते जैसे हज़ारों ---मिसरे .अश.आर जो हर आम-0-ख़ास के ज़बानज़द है और ज़र्ब उल मिस्ल , कहावतों की हैसियत रखते हैं
ऐसे प्रभावी शे’र या मिसरा इतनी बार सुनाते सुनाते इतने घिस पिट जाते हैं कि उसके असली शकल का पता ही नही चलता ।शायर का नाम भी याद नहीं रहता कि अमुक मशहूर शे;र किस शायर का है। उस पर दुखद बात यह कि जब किसी शायर का नाम न मिले तो उसे -’ग़ालिब’- मीर- दाग़- किसी के नाम से मंसूब कर देते है और उस शे’र का असल ख़ालिक [ रचयिता] का नाम गुमनाम ही रहता है।आजकल सोशल मीडिया के जमाने में तो यह प्रवृति और भी ज़ोर पकड़ रही है और लोग किसी का शे’र किसी के नाम से मंसूब कर देते हैं।
अब उन गुमनाम शायरों या कम नामचीन शायरॊ का नाम ढूँढ निकालना एक मश्क़ तलब, मिहनत और तहक़ी्क़ी काम है। लेकिन आज भी बहुत से ऐसे आलिम मुसन्निफ़ [ लेखक] हैं जो यह काम बड़ी मुहब्बत और शिद्दत से प्रामाणिक स्रोतों से खोज खोज कर सामने लाते रहे हैं और लाते रहेंगे। और आगे भी अदब की खिदमत ऐसे भी करते रहेंगे जैसे खलीकुज़्ज़माँ नुसरत साहिब [मुम्बई], सरवर आलम राज़ सरवर साहब.[अमेरिका] मुहम्मद शम्सुल हक़ साहब जैसे और भी बहुत से आलिम साहिबान ।
ऎसे सभी हमारे बुजुर्ग तहसीन-ओ-दाद के हक़दार हैं ,बधाई के पात्र हैं।
इस कारफ़रमाई से उन मशहूर शे’र [अश’आर] के असली गुमनाम शायर के नाम का हक़ अदा होगा जो इसके असल मुस्तहक हैं ।
चूंकि ये सारे काम ज़ियादातर उर्दू लिपि में ही लिखे और किए जा रहे है अत्त: मैने अपने हिंदी दाँ दोस्तों की सुविधा के लिए उसका हिंदी लिप्यन्तरण कर साभार समय समय पर क़िस्तवार पेश करूँगा ।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इस कार्य में मेरा कोई योगदान नहीं है। इस कार्य का सारा श्रेय क्रेडिट उन बुजुर्ग मुसन्निफ़ों का, लेखको को है जो अपनी मेहनत और तहक़ीक़ी काम के असल हक़दार है। मैं उनका आभारी हूँ।
सादर
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181
दिनांक 12-07-2026
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